प्रश्न : 'नायक' में संधि है –
(अ) द्वन्द्व सन्धि
(ब) अयादि सन्धि
(स) यण सन्धि
(द) गुण सन्धि
सही उत्तर: (ब) अयादि सन्धि
विस्तृत व्याख्या :
'संधि' का शाब्दिक अर्थ होता है – "मिलन" या "संयोग"।
संस्कृत और हिंदी व्याकरण में जब दो वर्ण (अक्षर) आपस में मिलते हैं और एक नया उच्चारण या रूप बनता है, तो उसे संधि कहते हैं।
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'नायक' शब्द में भी ऐसा ही एक संधि-परिवर्तन होता है। आइए विस्तार से समझते हैं।
'नायक' शब्द का मूल रूप:
नायक = नय् + अक
यहाँ “नय्” √धातु है जिसका अर्थ होता है "ले जाना" या "नेतृत्व करना" और “अक” प्रत्यय है, जो कर्त्ता वाचक संज्ञा बनाने के लिए जोड़ा जाता है।
जब 'नय्' (धातु) और 'अक' (प्रत्यय) मिलते हैं तो 'य' का परिवर्तन होकर 'आय' बन जाता है — यही प्रक्रिया कहलाती है:
अयादि संधि (Ayadi Sandhi)
अब समझें – अयादि सन्धि क्या होती है?
अयादि संधि वह संधि है जिसमें इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ वाले स्वरांत मूल शब्दों के साथ किसी प्रत्यय के जुड़ने पर ‘य’, ‘व’ आदि वर्णों का आय, अव, ए, ओ, आरि आदि में परिवर्तन होता है।
उदाहरण:
- नी + अय = नाय → नायक
- कृ + अ = कार → कारक
- शु + अ = शो → शोभा
- वि + अ = वे → वेद
इसी प्रकार: नय् + अक = नायक
→ यहाँ ‘य्’ का परिवर्तन होकर ‘आय’ हुआ — यह अयादि सन्धि है।
अब अन्य विकल्पों को देखें:
(अ) द्वन्द्व संधि:
- यह संधि दो समानार्थक शब्दों के योग से बनती है, जैसे: राम-लक्ष्मण, गंगा-यमुना, राजा-प्रजा
- ‘नायक’ किसी द्वन्द्व (जोड़ा) का शब्द नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
(स) यण संधि:
- यण संधि तब होती है जब किसी स्वर के बाद इ, उ, ऋ आते हैं और उनका परिवर्तन य्, व्, र् में होता है जैसे: रवि + उदय = रव्युदय
- 'नायक' में ऐसी कोई संरचना नहीं है।
(द) गुण संधि:
- गुण संधि में दो स्वर जब मिलते हैं तो उनका गुण स्वर बनता है, जैसे: पुत्र + अम्ब = पुत्राम्ब; गुरु + उपदेश = गुरूपदेश
- ‘नायक’ में कोई स्वर गुण रूप में नहीं आया है।
निष्कर्ष:
‘नायक’ शब्द में जो संधि हुई है, वह अयादि संधि के अंतर्गत आती है। इसमें 'नय्' धातु और 'अक' प्रत्यय के मिलने से ‘आय’ बना, और अंततः शब्द बना – नायक।
इसलिए प्रश्न का सही उत्तर है – (ब) अयादि संधि।
