आधुनिक जीवन शैली पर निबंध
विज्ञान ने जैसे-जैसे तरक्की की, मनुष्य वैसे-वैसे अपने सुख और सुविधा के लिए सामान जुटाता गया। गाँव-गाँव में पक्की सड़कें बन गयीं। वाहनों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुई। शहरों का तेजी से विकास हुआ। खेती योग्य भूमि पर ऊँचे-ऊँचे मकान बन गए। मल-जल निस्तारण के लिए नालों को नदियों से जोड़ दिया गया। भारी-भरकम जनरेटरों के शोर और धुएँ ने शहरों के वातावरण को विषैला बना दिया।
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जीवनशैली में बदलाव
पिछले कुछ साल में हमारी जीवन शैली में अनेक बदलाव आए हैं। खानपान, पहनावा, मकान, मनोरंजन के साधन सभी कुछ निरन्तर नये रूप में अपनाए जा रहे है। शरबत, सत्तू चना, गुड़, दही, मट्ठा आदि परम्परागत खाद्य पदार्थों की तुलना में चाय, कॉफी, नमकीन, शीतल पेय और अन्य प्रकार के डिब्बा बन्द खाद्य सामग्री का प्रयोग बढ़ रहा है।
घर-घर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आ गए हैं। गर्मी से बचने के लिये कूलर और वातानुकूलित संयंत्रों का प्रयोग बढ़े है। वाटर कूलर, रेफ्रिजरेटर, कम्प्यूटर और मोबाइल फोन दैनिक जीवन के लिये आवश्यक समझे जाने वाले उपकरण बन गए हैं। सोचिए, जीवन शैली में आ रहे इन बदलावों का हमारे शरीर और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ?
वातावरण पर प्रभाव
वातानुकूलित यंत्रों, रेफ्रिजरेटर आदि से कई विषैली गैसें (क्लोरोफ्लोरो कार्बन) निकलकर वायुमण्डल में मिल रही हैं। ये गैसें ओजोन परत का लगातार क्षरण कर रही हैं। तापमान में वृद्धि एवं पराबैंगनी किरणों के कारण चर्म कैंसर की सम्भावना बढ़ती जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बढ़ता प्रयोग ध्वनि प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है।
दैनिक जीवन में डिटर्जेन्ट्स और अन्य सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। इनके बनाने में ऐसे रसायनों का प्रयोग होता है जिनसे चर्म रोगों के होने का खतरा बना रहता है। इनके विकल्प के रूप में हमारे समक्ष प्रकृति द्वारा कई चीजें निःशुल्क उपलब्ध हैं।
तुलसी, हल्दी, पुदीना, नीम, आँवला, चन्दन, रीठा, मेंहदी जैसी अनेक वनस्पतियाँ हैं जो हमारे लिए दैनिक उपयोग के साथ-साथ औषधि का कार्य भी करती हैं। शादी-विवाह, जन्मदिन या अन्य सार्वजनिक उत्सवों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का जोर-जोर से बजाया जाना क्या उचित है?
ऐसे उत्सवों के एक दिन बाद वहाँ जाइए तो आपको चारों ओर कचरा ही कचरा दिखायी पड़ेगा। इधर-उधर फैली प्लास्टिक की तश्तरियाँ, गिलास, आइसक्रीम-टॉफियों एवं गुटकों के रैपर, प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
आधुनिक जीवन शैली का पर्यावरण पर प्रभाव
हमारी आधुनिक जीवन शैली ने सबसे अधिक नुकसान पर्यावरण को ही पहुँचाया है। अतः हम सभी का दायित्व है कि अपने द्वारा बिगाडे गए पर्यावरण को हम ही सुधारें। बस इसके लिये हमें अपनी जीवन शैली, आदतों में थोड़ा सुधार और बदलाव की आवश्यकता है। पारम्परिक जीवन शैली पर्यावरण के अनुकूल विकसित हुई थी। जबकि आधुनिक जीवनशैली ने उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया है।
पर्यावरण को बचाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
- डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थों का प्रयोग कम से कम करें।
- साबुन, क्रीम, डिर्जेन्ट्स का प्रयोग कम करके इनके स्थान पर प्राकृतिक चीजों से बने घरेलू नुस्खों का प्रयोग करें।
- इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, रेडियो, टी.वी., मोबाइल आदि का प्रयोग आवश्यकता अनुसार ही करें।
- प्लास्टिक थैलियों का उपयोग न करें और कपड़े का थैला उपयोग करें।
प्राकृतिक संसाधनों का दोहन
कृषि भूमि सीमित है और जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है और साथ ही गरीबी और अशिक्षा भी।
1. नदियों पर बाँध और उजड़ते जंगल
अधिक अन्न उत्पादन के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो रहा है।
2. अन्धाधुन्ध खनन
खनिजों के लिए अत्यधिक खनन से प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है।
3. रसायनों का प्रयोग
कीटनाशकों और रासायनिक खादों के कारण मिट्टी और जल प्रदूषित हो रहे हैं। जैविक खादों का प्रयोग आवश्यक है।
4. औद्योगीकरण
कच्चे माल की खपत बढ़ने से वनों की कटाई और प्रदूषण भी बढ़ रहा है।
FAQs - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय क्या है?
यह भारत सरकार का एक संगठन है जो नदियों के जल संरक्षण हेतु कार्य करता है।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्या है?
यह संस्था प्रदूषण की निगरानी और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है।
गंगा कार्य योजना कब शुरू हुई?
गंगा कार्य योजना 14 जनवरी, 1986 को शुरू की गई।
चिपको आन्दोलन क्या है?
यह वृक्षों की कटाई रोकने के लिए चलाया गया पर्यावरणीय आन्दोलन है।
डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ क्या होते हैं?
डिब्बों में बंद, रसायनों से संरक्षित खाद्य पदार्थ जिन्हें लंबे समय तक रखा जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक कचरा क्या होता है?
पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जो अनुपयोगी हो जाते हैं, इन्हें जलाने से प्रदूषण होता है।
